Ladkiyan.....
लडकिया स्कुल जा रही है अपनी अपनी साइकिलो पर
लडकिया स्कुल जा रही है अपनी अपनी साइकिलो पर
टूटी पगडंडियों पर लडखडाती साईकिल अपनी दिशा खोज ही लेती है
ये लडकिया सुबह के खाने में नमक की तरह मिल कर आई है
शाम के भोजन में इन्हें लकडियो की जगह जलना है
मगर फिर भी अपनी रसोई के स्याह अंधेरो से बहार निकली ये लडकिया
दिन की धुप में अपने जिस्म से अँधेरे नोच कर फेकती जा रही है
साईकिल की घंटियों का शोर इनके जीवन के कोलाहल पर बीस पड़ रहा है
हवा,इनके आँखों के कोरो पर चिपकी आसू की बूंदे पोछती जा रही है
ये लडकिया हसना सीख रही है अपनी अपनी साइकिलो पर
ये लडकिया जब मुसकुराती है मोतियों की माला सी सज जाती है
सींखचों में बंधे पशु को देख ये लडकिया अपनी गर्दन सहलाती है
जल्द ही इन बालाओ को परे धकेल लडकिया आगे बढ़ जाती है
बिखरे मोतियों सी मुस्कान वाली लडकिया स्कुल के पायेदान चढ़ जाती है
लडकिया परिचित है इस बात से की उनकी स्वतंत्रता के ये ही एक आध बरस शेष है
स्कुल के रस्ते पर अपनी साइकिलो पे ये लडकिय स्वतंत्र है
ये आखरी बरस है इन मानवियों के जीवन के
जल्द ही इन्हें बेमौत मरना होगा
लडकियां बंद जाएँगी सींखचो में पशुवो की भाती किसी खूटे से
उसी के आस पास इन्हें ताउम्र चरना होगा
बस तब तक लडकिया स्कुल जा रही है अपनी अपनी साइकिलो पर
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