मंगलवार, 23 अप्रैल 2013

                                                  तुम हँसो 
अच्छा लगता है जब झुर्रियो से भरे तुम्हारे चेहरे पर झुर्रियो को खेलते देखता हु 
अच्छा लगता है  क्योंकि उमर भर मैं बस देखता ही रह गया 
उम्र को घटते हुए झुर्रियों को बढ़ाते हुए 
तुम अपनी इक्शयो का घर्भ्पात करती रही मुस्कुराती रही 
इस आवरण में जाने क्या क्या छुपाती रही 
कुछ भी तो न कर सका मैं तुम्हारे लिए 
तुम्हारे साधारण से सपने भी अधूरे अधलिखे से रह गए 
हमारे रिश्ते में मेरी जगह भी मैं था और तुम्हारी जगह भी 
तुम घुलती पिघलती विलुप्त सी हो गयी 
इस घुलने मिलने मिट जाने की प्रक्रिया में ही
तुम्हारे स्त्रीत्व का उद्बोधन था 
और इसका सतत प्रोत्साहन ही मेरे पुरुसर्थ का संबोधन था 
आज जब हम जिन्दगी से खली गिलास हो चुके है 
छलकने बहकने के भय से मुक्त है 
मैं खुद को वादाखिलाफी का दोषी पता हु 
तुम्हारी आँखे सपनो से बंज़र हो गयी 
तुम्हारी मुस्कान फूल से पत्थर हो गयी 
इसलिए भी अच्छा लगता है जब झुर्रियों से भरे निस्तेज चेहरे पर 
रह रह कर उभर आती है हसी 

आदर्श शुक्ल 

(ये कविता आगे भी है समय की कमी के कारन पूरा नहीं लिख पया )

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