दोस्तो अपने ब्लॉग पर पहला पोस्ट डाल रहा हूँ। मेरी एक पुरानी कविता है ज़रा नज़र-ए-इनायत करें:
फासला
एक बात कहुँ मानोगी?
चलो कुछ देर हाथ छोड कर चले!
अपने अंतस की असुरक्षा की गिरहे खोल दे!
मुक्त-उनमुक्त हो जाने कि स्वतंत्रता दे दे!
जानती हो ना पनपने के लिए धुप-पानी चाहिए पूरी तरह..
हम अपनी परछाईयों से रोक रहे है एक दुजे को पनपने से!
दम घुट जाता है बंद कमरे मे!
हमे खोलनी होगी खिडकी कोई!!
फासला
एक बात कहुँ मानोगी?
चलो कुछ देर हाथ छोड कर चले!
अपने अंतस की असुरक्षा की गिरहे खोल दे!
मुक्त-उनमुक्त हो जाने कि स्वतंत्रता दे दे!
जानती हो ना पनपने के लिए धुप-पानी चाहिए पूरी तरह..
हम अपनी परछाईयों से रोक रहे है एक दुजे को पनपने से!
दम घुट जाता है बंद कमरे मे!
हमे खोलनी होगी खिडकी कोई!!
बढ़िया कविता भैया...
जवाब देंहटाएंअच्छी शुरूआत है..अब तो आदर्शनगर रोज़ का अड्डा है ।
कोशिश रहेगी कि नियमित रहूँ।
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