शनिवार, 2 फ़रवरी 2013

फासला

दोस्तो अपने ब्लॉग पर पहला पोस्ट डाल रहा हूँ। मेरी एक पुरानी कविता है ज़रा नज़र-ए-इनायत करें:
        फासला
 एक बात कहुँ मानोगी?
 चलो कुछ देर हाथ छोड कर चले!
 अपने अंतस की असुरक्षा की गिरहे खोल दे!
 मुक्त-उनमुक्त हो जाने कि स्वतंत्रता दे दे!
 जानती हो ना पनपने के लिए धुप-पानी चाहिए पूरी तरह..
 हम अपनी परछाईयों से रोक रहे है एक दुजे को पनपने से!
 दम घुट जाता है बंद कमरे मे!
 हमे खोलनी होगी खिडकी कोई!!

2 टिप्‍पणियां:

  1. बढ़िया कविता भैया...
    अच्छी शुरूआत है..अब तो आदर्शनगर रोज़ का अड्डा है ।

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  2. कोशिश रहेगी कि नियमित रहूँ।

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